कभी-कभी वेदना के शब्द भी अक्षरहीन हो जाते हैं... हाथरस की घटना को सुनकर मेरे पास उपलब्ध शब्दकोशों में से पीड़ा, दर्द, आक्रोश, शर्मसारिता, क्षोभ आदि शब्द भी बौने प्रतीत होते हैं।
वैसे तो यादे मां लक्ष्मी, दुर्गा, काली व मां सरस्वती को पूजने वाली धरती है। कहा जाता है कि- यत्र नारी पूज्यंते रमन्ते तत्र देवता। लेकिन हाथरस की घटना से एक बार फ़िर मानवता शर्मसार हुई है।
19 वर्षीय मनीषा जो अपनी माँ के साथ खेत मे कुछ दूरी पर घास काट रही थी, जिसके साथ चार लोगों ने हैवानियत की, उसका गला घोंट दिया, उसकी रीढ़ की हड्डी को तोड़ दिया गया और कल उसने दम तोड़ दिया।
क्या कहूं मैं? क्या जो समाज अपने को आधुनिकता की ओर गतिमान बता रहा है वास्तव में वह गर्त की ओर गतिमान है? न जाने कितनी घटनाओं से सबक हम सब ने नहीं लिया, और जानवर बनते जा रहे है।
ऐसे नर-पिशाचों को देर-सेवर सजा तो मिल ही जायेगी। जैसे दिल्ली की निर्भया और बैंगलरू की डा॰ प्रियंका के गुनहगारों को सजा मिली ही थी.... बस किसी को 7 वर्ष की लम्बी लडाई के बाद तो किसी को ऑन द स्पॉट (On the Spot) ।
मगर सोचनीय यह है कि इन सजाओं के बावजूद एक बार फ़िर एक हैवानियत हाथरस की....
समाज के भीतर छिपे कुछ नर-पिशाच है जो पूरे समाज को दूषित कर रहे हैं। इस केस में ध्यान दिया जाय तो पुलिस का रवैया भी गैर-जिम्मेदाराना पाया गया। पहले तो उन्हे गैंगरेप का केस दर्ज करने में 8 दिन लग जाते है। और फ़िर कल का रवैया तो शर्मनाक ही है जिसमें परिवार वालों की बिना अनुमति के ही जबरन रात में ही चिता सजायी और अन्तिम संस्कार कर दिया।
एक तरफ तो हम सभी नारी-सशक्तीकरण की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। कहते है कि आज नारियां हर जगह अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहीं है, उनकी भागीदारी पुरुषों के बराबर है। संसद से लेकर सीमा सुरक्षा तक अपनी भागीदारी सुनिश्चित करा रहीं है। लेकिन मेरा प्रश्न अब भी वहीं है आखिर ऐसी घटनाएं क्यों?
अब जरूरत सिर्फ कानूनों में सिर्फ कठोर परिवर्तन की ही नहीं बल्कि एक सख्त समाज के निर्माण का भी है। सख्त समाज का निर्माण किसी अन्य को नहीं बल्कि हमें और आपको करना है।
जहाँ तक बात कानून की की जाय तो वास्तव में उनमें भी सख्त प्रावधानों की आवश्यकता है। शीर्ष पदों पर पीठासीन बुद्धिजीवियों से मेरा आग्रह है कि अंग्रजों के जमाने से चली आ रही दंड संहिता में संशोधन कर धाराओं में सख्त प्रावधान लायें।
एक बार फ़िर मै कहता हूँ इस जानवर रूपी इंसानों का स्वस्थ समाज में जगह नहीं होना चाहिये, उम्मीद करता हूँ आगे से ख्याल रखा जायेगा।
RIPManisha
- शिवम गुप्ता 'विधि छात्र'
गोरखपुर ।
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