भारतीय राजनैतिक समाजशास्त्र के प्रकांड पुरोधा, तत्कालीन राजनीति में पंडित नेहरू की गूंजती शहनाई से असहमत एक हनकदार निजता भरे आत्मविश्वास की आवाज़, भारत की व्यवस्थाओं के सामने ‘समाजवाद’ की पसीने भरी ख़ुशबू का चिरंजीवी लोबान सुलगाने वाले, भारतीयता व उसकी प्राच्यविद्या के अघोषित कुलाधिपति, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समर्पित सेनानी, स्वातन्त्र्योत्तर भारत में समाजवादी आंदोलन के प्रतीक पुरुष व प्रसिद्ध सामाजिक चिंतक स्व० राम मनोहर लोहिया जी को पुण्यतिथि पर प्रणाम ! I
कहते हैं कि दूसरों के लिए जीने वाला कभी मरता नहीं है। यह सच है कि लोहिया जी अपने प्रखर, तेजस्वी व दूरदर्शी विचारों के माध्यम से आज भी सबके दिलों में जिंदा हैं।
लोहिया के समाजवादी आंदोलन की संकल्पना के मूल में अनिवार्यत: विचार और कर्म की उभय उपस्थिति थी- जिसके मूर्तिमंत स्वरूप स्वयं डॉ॰ लोहिया थे और आजन्म उन्होंने ‘कर्म और विचार’ की इस संयुक्ति को अपने आचरण से जीवन्त उदाहरण भी प्रस्तुत किया।
लोहिया राजनीतिक शुचिता के पक्षधर थे जो राजनीति की गंदी गली में भी शुद्ध आचरण की बात करते थे। वे एकमात्र ऐसे राजनेता थे जिन्होंने अपनी पार्टी की सरकार से खुलेआम त्यागपत्र की मांग की।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के राजनेताओं में लोहिया मौलिक विचारक थे। लोहिया के मन में भारतीय गणतंत्र को लेकर ठेठ देसी सोच थी। अपने इतिहास, अपनी भाषा के सन्दर्भ में वे कतई पश्चिम से कोई सिद्धांत उधार लेकर व्याख्या करने को राजी नहीं थे। सन् 1932 में जर्मनी से पीएचडी की उपाधि प्राप्त करने वाले राममनोहर लोहिया ने साठ के दशक में देश से अंग्रेजी हटाने का जो आह्वान किया। अंग्रेजी हटाओ आन्दोलन की गणना अब तक के कुछ इने गिने आंदोलनों में की जा सकती है। उनके लिए स्वभाषा राजनीति का मुद्दा नहीं बल्कि अपने स्वाभिमान का प्रश्न और लाखों–करोडों को हीन ग्रंथि से उबरकर आत्मविश्वास से भर देने का स्वप्न था– ‘‘मैं चाहूंगा कि हिंदुस्तान के साधारण लोग अपने अंग्रेजी के अज्ञान पर लजाएं नहीं, बल्कि गर्व करें। इस सामंती भाषा को उन्हीं के लिए छोड़ दें जिनके मां बाप अगर शरीर से नहीं तो आत्मा से अंग्रेज रहे हैं।’’
हलांकि लोहिया भी जर्मनी यानी विदेश से पढा़ई कर के आए थे, लेकिन उन्हें उन प्रतीकों का अहसास था जिनसे इस देश की पहचान है। शिवरात्रि पर चित्रकूट में रामायण मेला उन्हीं की संकल्पना थी, जो सौभाग्य से अभी तक अनवरत चला आ रहा है। आज भी जब चित्रकूट के उस मेले में हजारों भारतवासियों की भीड़ स्वयमेव जुटती है तो लगता है कि ये ही हैं जिनकी चिंता लोहिया को थी, लेकिन आज इनकी चिंता करने के लिए लोहिया के लोग कहां हैं?
लोहिया जी केवल चिन्तक, कर्मवीर ही नहीं थे, बल्कि वे लेखक भी थे अनेकों विषयों पर अपने विचार लेख एवं पुस्तकों के रूप में प्रकाशित कीं। उनकी कुछ रचनाएँ हैं-
• अंग्रेजी हटाओ
•इतिहास चक्र
•देश, विदेश नीति-कुछ पहलू
•धर्म पर एक दृष्टि
•भारतीय शिल्प
•भारत विभाजन के गुनहगार
•मार्क्सवाद और समाजवाद
•राग, जिम्मेदारी की भावना, अनुपात की समझ
•समलक्ष्य, समबोध
•समदृष्टि
•सच, कर्म, प्रतिकार और चरित्र निर्माण आह्वान
•समाजवादी चिंतन
•संसदीय आचरण
•संपूर्ण और संभव बराबरी और दूसरे भाषण
•हिंदू बनाम हिंदू।
पुण्यतिथि पर प्रणाम नीतिऋषि !🙏🏻💐
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