बेमिसाल थे डॉ एपीजे अब्दुल कलाम !

भारतीयता के सबसे बड़े प्रतीक पुरूष, अजातशत्रु, युग-ऋषि, विज्ञान-गन्धर्व कलाम साहब का जीवन भी कमाल का था। 83 वर्ष की अवस्था  में भी उनमें युवाओं जैसा जोश था। गजब की स्फूर्ति, जोश और हिम्मत थी उनमें। 

कहते है ना व्यक्ति अपने कर्मों से ही महान बनता है। एपीजे अब्दुल कलाम उन्हीं महान हस्तियों में से एक है जिन्होंने अपने जीवन पर्यन्त इतने महान काम किये जो अपने देश की आने वाली पीढ़ियों के लिए भी अजूबे से कम नही है। कलाम जी के जीवन हर एक एक पड़ाव हर तरह के लोगों के लिए प्रेरणादायक बने रहेंगे। 
सादगी के सौदर्य को उम्र के साथ निरंतर बढती अपनी ज्ञान पिपासा से क्रमश: निखारने वाले कलाम आज पूरी युवा पीढ़ी के लिए एक आदर्श हैं। संजीदगी सिखाने वाले दुनिया भर के तमाम धर्म-ग्रंथों को अपने जिव्हाग्र पर रखने वाले कलाम जब कभी छोटे बच्चों के साथ खेलते-कूदते हँसते-खिलखिलाते दिखते तो यूँ लगता था जैसे सहजता ने स्वयं शरीर धारण कर लिया हो। दुनिया में आदर्श माने जाने वाले एक-एक दुर्लभ मानवीय गुणों को समग्रता के साथ सुलभता से धारण करने वाली उस दीवानगी का नाम ही एपीजे अब्दुल कलाम है।

वो एकमात्र ऐसे राष्ट्रपति थे, जो राष्ट्रपति बनने से पूर्व पहले भारत रत्न बने। इससे पहले 1952 में सी वी रमण के छोड़कर किसी वैज्ञानिक को इस पुरस्कार के लायक नहीं समझा गया था। इसके अलावा उन्हें पद्म विभूषण, रामानुजन पुरस्कार, मानद डॉक्टेरेट, डॉक्टर ऑफ साइंस आदि जैसे कई सम्मान से भी सम्मानित किया गया था। जिस तरह से उन्होंने अपने सफर  को पूरा किया, उन्हें हमेशा स्मरण किया जाएगा।

1 मार्च , 1998 को राष्ट्पति भवन में भारत रत्न के पुरस्कार वितरण समारोह में कलाम काफी नर्वस थे और अपनी नीली धारी की टाई को बार बार छू कर देख रहे थे।

कलाम को इस तरह के औपचारिक मौकों से चिढ़ थी जहाँ उन्हें उस तरह के कपड़े पहनने पड़ते थे जिसमें वो अपनेआप को कभी सहज नहीं पाते थे। सूट पहनना उन्हें कभी रास नहीं आया। यहाँ तक कि वो चमड़े के जूतों की जगह हमेशा स्पोर्ट्स शू पहनना ही पसंद करते थे। 

डॉ कलाम हिंदुस्तान के आसमान पर तब उभरे जब निराशा और ना उम्मीदी कि धुंध छायी हुई थी। बारूद के ढेरों पर विराजमान दुनिया हमें बड़ी बड़ी आँखे दिखा रही थी। पडीसी देश जो लगातार परेशान किये हुए था। टैब कलाम ने देश को एक एक कर अग्नि, आकाश और पृथ्वी जैसी मिसाइलें दी। 

इन्होंने मुख्य रूप से एक वैज्ञानिक और विज्ञान के व्यवस्थापक के रूप में चार दशकों तक रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) संभाला व भारत के नागरिक अंतरिक्ष कार्यक्रम और सैन्य मिसाइल के विकास के प्रयासों में भी शामिल रहे। इन्हें बैलेस्टिक मिसाइल और प्रक्षेपण यान प्रौद्योगिकी के विकास के कार्यों के लिए भारत में 'मिसाइल मैन' के रूप में जाना जाता है।


इन्होंने 1974 में भारत द्वारा पहले मूल परमाणु परीक्षण के बाद से दूसरी बार 1998 में भारत के पोखरण-द्वितीय परमाणु परीक्षण में एक निर्णायक, संगठनात्मक, तकनीकी और राजनैतिक भूमिका निभाई। 

कलाम शायद भारत के पहले ग़ैर राजनीतिक राष्ट्पति थे। उनके समकक्ष अगर किसी को रखा जा सकता है तो वो थे डाक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन। लेकिन राधाकृष्णन भी पूरी तरह से ग़ैर राजनीतिक नहीं थे और सोवियत संघ में भारत के राजदूत रह चुके थे।

नियम से सुबह की नमाज़ पढ़ते थे कलाम:

डाक्टर कलाम के प्रेस सचिव रहे एस एम ख़ाँ बताते है कि बहुत व्यस्त राष्ट्रपति होने के बावजूद कलाम अपने लिए कुछ समय निकाल ही लेते थे. उनको रुद्र वीणा बजाने का बहुत शौक था। वो धार्मिक मुसलमान थे और हर दिन सुबह यानि फ़ज्र की नमाज़ पढ़ा करते थे। 

 वे कुरान और गीता पढ़ते थे । वो स्वामी थिरुवल्लुवर के उपदेशों की किताब 'थिरुक्कुरल' तमिल में पढ़ा करते थे। वो पक्के शाकाहारी थे और शराब से उनका दूर दूर का वास्ता नहीं था। पूरे देश में निर्देश भेज दिए गए थे कि वो जहाँ भी ठहरे उन्हें सादा शाकाहारी खाना ही परोसा जाए। उनको महामहिम या 'हिज़ एक्सलेंसी' कहलाना भी कतई पसंद नहीं था। 


वाजपेई जी ने दिया था कलाम को मंत्री बनने का न्योता:

मशहूर पत्रकार राज चेंगप्पा अपनी किताब 'वेपेंस ऑफ़ पीस' में लिखते हैं, 'उस बैठक में जब इंदिरा गाँधी ने कलाम का अटल बिहारी वाजपेई से परिचय कराया तो उन्होंने कलाम से हाथ मिलाने की बजाए उन्हें गले लगा लिया। ये देखते ही इंदिरा गाँधी शरारती ढंग से मुस्कराई और उन्होंने वाजपेई की चुटकी लेते हुए कहा, 'अटलजी लेकिन कलाम मुसलमान हैं.' तब वाजपेई ने जवाब दिया, 'जी हाँ लेकिन वो भारतीय पहले हैं और एक महान वैज्ञानिक हैं।'

कलाम ने इस प्रस्ताव पर पूरे एक दिन विचार किया. अगले दिन उन्होंने वाजपेई से मिल कर बहुत विनम्रतापूर्वक इस पद को अस्वीकार कर दिया। उन्होंने बताया कि 'रक्षा शोध और परमाणु परीक्षण कार्यक्रम अपने अंतिम चरण में पहुंच रहा है। वह अपनी वर्तमान ज़िम्मेदारियों को निभा कर देश की बेहतर सेवा कर सकते हैं।'

दो महीने बाद पोखरण में परमाणु विस्फोट के बाद ये स्पष्ट हो गया कि कलाम ने वो पद क्यों नहीं स्वीकार किया था। 

वाजपेई जी ने ही राष्ट्रपति पद के लिए डॉ कलाम को चुना:

10 जून, 2002 को एपीजे अब्दुल कलाम को अन्ना विश्वविद्यलय के कुलपति डाक्टर कलानिधि का संदेश मिला कि प्रधानमंत्री कार्यालय उनसे संपर्क स्थापित करने की कोशिश कर रहा है. इसलिए आप तुरंत कुलपति के दफ़्तर चले आइए ताकि प्रधानमंत्री से आपकी बात हो सके. जैसे ही उन्हें प्रधानमंत्री कार्यालय से कनेक्ट किया गया, वाजपेई फ़ोन पर आए और बोले, 'कलाम साहब देश को राष्ट्पति के रूप में आप की ज़रूरत है.' कलाम ने वाजपेई को धन्यवाद दिया और कहा कि इस पेशकश पर विचार करने के लिए मुझे एक घंटे का समय चाहिए। वाजपेई ने कहा कि, 'आप समय ज़रूर ले लीजिए। लेकिन मुझे आपसे हाँ चाहिए, ना नहीं।

एक मोची को बनाया राष्ट्रपति मेहमान :

राष्ट्रपति बनने के कुछ समय बाद ही कलाम को एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए केरल राजभवन में जाना था। जहां वे अपनी ओर से राष्ट्रपति मेहमान के तहत किसी भी दो मेहमान को बुला सकते थे। उन्होंने भवन के बाहर बैठे एक मोची और एक छोटे से होटल मालिक को आमंत्रित किया।ऐसी मिसाल शायद ही कोई और राष्ट्रपति कायम कर सके। 

अपने परिवार को राष्ट्रपति भवन में ठहराने के लिए कलाम ने निजी अकाउंट से दिया साढ़े तीन लाख का चेक

मई 2006 में कलाम ने अपने परिवार के करीब 52 लोगों को दिल्ली आमंत्रित किया. ये लोग आठ दिन तक राष्ट्रपति भवन में रुके। कलाम ने उनके राष्ट्रपति भवन में रुकने का किराया अपनी जेब से दिया। यहाँ तक कि एक प्याली चाय तक का भी हिसाब रखा गया। वो लोग एक बस में अजमेर शरीफ़ भी गए जिसका किराया उन्होंने ही भरा। उनके जाने के बाद कलाम ने अपने अकाउंट से तीन लाख बावन हज़ार रुपयों का चेक काट कर राष्ट्रपति भवन कार्यालय को भेजा था। 

अनाथालय को दिया इफ्तार का पैसा: 

1 नवंबर , 2002 कलाम ने राष्ट्रपति भवन के आतिथ्य विभाग को फ़ोन लगाया और इफ्तार की खर्च राशि को पूछा। उन्होंने बताया कि इफ़्तार भोज में मोटे तौर पर ढाई लाख रुपए का ख़र्च आता है। कलाम ने कहा, 'हम ये पैसा अनाथालय को क्यों नहीं दे सकते ? आप अनाथालयों को चुनिए और ये सुनिश्चित करिए कि ये पैसा बरबाद न जाए।'

राष्ट्रपति भवन की ओर से इफ़्तार के लिए निर्धारित राशि से आटे, दाल, कंबलों और स्वेटरों का इंतेज़ाम किया गया और उसे 28 अनाथालयों के बच्चों में बाँटा गया।

हम भी के आदर्श , प्रिय गुरु, भारत रत्न स्व एपीजे अब्दुल कलाम साहब के जन्मदिवस पर उन्हें सादर नमन।

 प्रणाम राष्ट्र ऋषि। 🙏❤️🇮🇳

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