Skip to main content

अधिवक्ता दिवस विशेष : आसान नहीं है विधि व्यवसाय !

डॉ राजेन्द्र प्रसाद जी 1915 में स्वर्ण पद के साथ विधि परास्नातक (एलएलएम) की परीक्षा पास की और बाद में लॉ के क्षेत्र में ही उन्होंने डॉक्ट्रेट की उपाधि भी हासिल की। राजेन्द्र बाबू कानून की अपनी पढाई की प्रेक्टिस भागलपुर, बिहार में किया करते थे।

डॉ राजेन्द्र जी के जयंती पर अधिवक्ता समाज “अधिवक्ता दिवस” के रूप में मनाते है। इसीलिए आज का दिन अधिवक्ता,विधि व्यवसायियों व विधि छात्रों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

विधि-व्यवसायी (अधिवक्ता) की भूमिका केवल वादों के निस्तारण तक सीमित नहीं होती है। अधिवक्ता वर्ग समाज में शान्ति-व्यवस्था बनाये रखने में भी महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

देशभर में हज़ारोंं लोग प्रतिवर्ष लॉ ग्रेजुएट होकर आते हैंं। अलग अलग राज्यों की अधिवक्ता सूची में शामिल होकर विधि व्यवसाय आरंभ करते हैंं, परन्तु वकालत नितांत चुनौतीपूर्ण पेशा है। इस पेशे में लाइम लाइट के साथ चुनौतियां भी बहुत हैं। यदि इस पेशे में थोड़ी गंभीरता रख ली जाए तो आपका भविष्य स्वर्णिम है।

अधिवक्ता समाज में भाई-चारे की भावना बढ़ाकर समाज की विधिक व्यवस्था कायम रखने का गुरूतर कार्य सम्पन्न करते हैं। विधि व्यवसायी न्याय को प्रश्रय देते हैं क्योंकि वे नागरिकों के अधिकारों तथा स्वतंत्रताओं के पोषक होते हैं और न्यायालय के माध्यम से उनके अधिकारों तथा स्वतंत्रताओं की रक्षा करते हैं। इससे समाज में विधि का शासन साकार होता है।
वकील, विधि व्यवसायी का कार्य आसान नही है और न ही उनके दायित्व। एडवोकेट…एक बुद्धिजीवी वर्ग होता है। एक विधि का छात्र होने के नाते.. हमे विधि प्रोफेशन पर गर्व होता है…. क्योंकि समाज मे एक एडवोकेट ही वह व्यक्ति होता है प्रत्येक व्यक्ति को न्याय दिलाने के लिए हमेशा तत्पर रहता है। एक एडवोकेट की भूमिका आज के समाज वहां बहुत बढ़ जाती है जब किसी गरीब व्यक्ति को उसके हक से वंचित किया जाता है। वहां पर एक एडवोकेट ही उस व्यक्ति की हक को दिलाते है। विधि प्रोफेशन के लिए के बारे में लिखे जाये तो शब्द थक जायेगी ।

विधि के कॉलेज में दाखिला लेने के बाद मैंने भी एक अलग सा अनुभव, विधि छात्र होने में गर्व का अनुभव होता है। यह एक ऐसा पेशा है जिसमें आपको हर पल कुछ नया सीखने को मिलता है। इसमें कोई यह नही कह सकता कि वो इस विषय के विशेषज्ञ है। वरन हर दिन नए वाद, बदलते परिवेश के साथ नए नियम, कानून, अलग अलग न्याय निर्णय। इन सभी से एक विधि व्यवसायी को अपडेट रहना होता है।

विधि व्यावसायी का दायित्व केवल अदालतों तक सीमित नही रहा है। एक विधि व्यवसायी तो हर फील्ड में सक्रिय रूप से अपनी भूमिका निभाते रहे है, और भविष्य में भी बढ़-चढ़कर निभाते रहेंगे।

विधि-व्यवसाय कोई व्यापार नहीं होता। इस व्यवसाय का मुख्य उद्देश्य धन-अर्जन करना नहीं है, अपितु न्याय-प्रशासन में अपनी अग्रणी भूमिका का निर्वहन करना है जिससे समाज में शान्ति, व्यवस्था तथा न्याय कायम रखा जा सके। निःसन्देह समाज की जटिल समस्याओं का समाधान ढूंढने, जनता के अधिकारों तथा स्वतंत्रताओं की सुरक्षा करने और विधि का शासन कायम रखने में प्रमुख भूमिका का निर्वहन करने में विधि-व्यवसाय को जो महत्वपूर्ण स्थान है, वह समाज के किसी वर्ग से छिपा नहीं है। अपनी विलक्षण प्रतिभा तथा सामाजिक दायित्व की भावना से अधिवक्ता वर्ग आसन्न कठिन परिस्थितियों को अनुकूल बनाकर उनका समाधान प्रस्तुत करने का महत्वपूर्ण कार्य करते हैं जिसके लिए उन्हें समाज से सम्मान तथा ख्याति प्राप्त होती है।

विधि-व्यवसायी (अधिवक्ता) का प्राथमिक कर्तव्य संविधान के अनुसार-विधि का शासन समाज में बनाए रखने में अपना योगदान प्रदान करना होता है। उसे न्याय के क्रमिक विकास को प्रोन्नत करना है और संविधान में प्रदत्त नागरिकों के मूलाधिकारों के प्रवर्तन में न्यायालय की सहायता करनी होती है। साथ ही अपने विधिक ज्ञान, योग्यता और नैतिकता द्वारा उसे नागरिकों का विश्वास तथा सद्भाव प्राप्त करना होता है, जो उसकी अमूल्य पूंजी होती है।

अधिवक्ता के व्यवसाय का यह भी अर्थ है कि दूसरे व्यक्तियों को सेवायें प्रदान करना। इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि अधिवक्ता प्रत्येक व्यक्ति को विधिक सेवा प्रदान करते हुए विधिक सेवा प्रदान करने के बदले में पारिश्रमिक लेता है लेकिन फिर भी यह व्यवसाय एक सेवाभावी प्रवृत्ति से प्रेरित होकर किया जाने वाला व्यवसाय होने के कारण इसे हम व्यापार अथवा वाणिज्य की श्रेणी में नहीं रख सकते हैं और न ही यह रखा जा सकता है, क्योंकि मानव के अधिकार की रक्षा करने में एक मूलभूत मानवता की भावना छिपी होती है। उस मानवीय मूल्यों की रक्षा के लिए किये गये कार्य की कीमत रूपयों में नहीं आंकी जा सकती। समाज हो या संसद विधि क्षेत्र से जुड़े लोग सक्रिय योगदान निभाते है।

चंद शब्दों में कहे तो जब-जब किसी व्यक्ति के अधिकारों का समाज द्वारा, किसी व्यक्ति द्वारा, या सरकार द्वारा हनन होता है तो बस एक न्याय पाने की एक उम्मीद नजर आती है वहां एक विधि से जुड़ा व्यक्ति या समाज न्याय के लिए तब तक लड़ता है जब तक न्याय न मिल जाये।
विधि से जुड़ा व्यक्ति समाज मे अपना अलग स्थान रखता है वह समाज के बीच में रहकर समाज को नई दिशा दिखता है। भले ही कुछ चंद लोग काले कोट वाले को लोगों से केस के नाम पर एक पैसा कमाने वाला, फसाने वाला समझते हालांकि इनकी संख्या बहुत ही कम है जो ऐसा सोचते है क्योंकि वे विधि प्रोफेशन अभी जाना ही नही। लेकिन फिर भी कहूँ तो इन चंद लोगों को अपने पेशे से जुड़े कार्य के लिए या न्याय के लिए अंत मे विधि व्यवसायी के पास ही जाते है क्योंकि उन्हें इतना पता है उन्हें सलाह या न्याय इन्ही से मिलेगी।

मुझे विधि कॉलेज में दाखिला लिए दो वर्ष होने को है। अभी सीखने की शुरुआत हुई है, जो अनवरत जीवन पर्यन्त चलने वाला है। इतना जरूर कह सकता हूँ कि सीखने व समाज को एक दिशा दिखाने में विधि से जुड़े लोगों का योगदान काफी अहम है। एक बार पुनः देश के प्रथम राष्ट्रपति ‘भारत रत्न’ डॉ राजेंद्र प्रसाद जी की जयंती पर उन्हें सादर नमन व विधि से जुड़े सभी लोगो को अधिवक्ता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

– शिवम गुप्ता (विधि छात्र)


Comments